पत्थरों का शहर

अपने शहर में बेगानों सा रहता हूं, ये हमारी उलझन है या उलझने आम है। काम तमाम रहता है बोझ बनके , या जिन्दगी बोझिल सी लगती है। अपने पराए हुए लगते है, अब तो, लगता है, पत्थरों के शहर में रहते है। जान जो देते थे एक – एक बात पर मेरे लिए आजContinue reading “पत्थरों का शहर”