उलझन

किन उलझनों से गुजर रहा हूं ये मैं जानता हूं या वक्त जानता है, लोगों का क्या है वो तो हमेशा मुस्कुराते देखते हैं। रात अंधेरी और अनजान रास्तेकैसे निकल रहा हूं ये मैं जानता हूं। मैं वक्त के फितरत को जानता हूं मैंवो कभी रुकता नहीं,वरना एक जख्म काफी था जिंदगी के लिए।

जीना तो पड़ेगा ही

राह पथरीली हो या स्वर्ग से सुंदर चलना तो पड़ेगा हीजिंदगी कितनी भी मुश्किलों से भरी हो जीना तो पड़ेगा ही। रोते रोते हंसना है ये तो सीखना पड़ेगा हीरिश्तों की उलझनों में उलझ कर रिश्तों को बचाना पड़ेगा ही। चाहे बात कितनी भी बिगड़ जाए बिगड़ी बातों को बनाना पड़ेगा ही।

उलझन

क्या लिखूं ए दिल…., है बड़ी मुश्किल रात दिन के बात में उलझन बनीदिन निकलता नहीं रात जाती नहीं इश्क सी हो गई है अंधेरों सेहम तो दिन को भी रात समझते हैं क्या लिखूं ए दिल…. ,है बड़ी मुश्किल। बात कुछ भी नही,बड़ी बात हैबात कुछ भी नही,बड़ी बात है। ये समझ के नाContinue reading “उलझन”