जिन्दगी

कितनी अरमानों से निकली तू। कितनों अरमानों से खेली तू। ऐ जिन्दगी जीने के लिए क्या – क्या नहीं झेली तू। अपनों से अनजानों तकशहर से विरानों तक,क्या – क्या मंजर ना देखी तू। कभी तन्हाई में ,कभी महफ़िल में,जाने क्या – क्या पापड़ बेली तू। कभी तूफानों से ,कभी अरमानों से,ना जाने कितनों कीContinue reading “जिन्दगी”