पत्थरों का शहर

अपने शहर में बेगानों सा रहता हूं,

ये हमारी उलझन है या उलझने आम है।

काम तमाम रहता है बोझ बनके ,
या जिन्दगी बोझिल सी लगती है।

अपने पराए हुए लगते है, अब तो,
लगता है, पत्थरों के शहर में रहते है।

जान जो देते थे एक – एक बात पर मेरे लिए
आज वो भी नकाव में चलते है।

रात को दिन का रोना ,दिन को रात का रोना

ये सूरत मेरी है या सूरत ए आम है।

Published by मनवीर

मैं रीडर और थिंकर हूं धन्यवाद

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