अबोध

अल्प ज्ञानी ,कुछ ना मानी।
कुछ सही कुछ ग़लत पैमानी।।

ना दिन ना रात जानि।
अल्प बोधी वयक्त अभिमानी।।

शोभा सुंदर की बात बेईमानी।
अक्खर पक्कर सब सहानी।।

तृष्णा कृष्णा घोर माया।

ना ममता ना देही काया।।

रस रंग सब उपज की खानी।
मन में बसे दिल में नाही।
दिल में बसे सब जगह पांही।।।

अनहद नाद सुवाद सबे ओर।
जिन सुना सब पाया।।

ज्ञान जगी अभिमान ना उपजे।
सत्य की खोज में हरदम रहे।।

प्रेम की भाषा प्रेम से जाने।
प्रेम ही प्रेम , प्रेममय वाणी।।

चुटकुले

मैं घंटे भर से तुम्हे समझा रहा हूं और तुम्हारी समझ में बात नहीं आ रही है! तुम्हारे दिमाग में गोबर भरा है।
जब आपको पता है तो उसे घंटे भर से चाट क्यों रहे है?

पिता अपने बच्चे से – बेटा तुम्हे कितनी बार समझाया है कि वह सचमुच का शेर नहीं तस्वीर है तो फिर घबराते क्यों हो?
बच्चा – मैं घबराया नहीं पिताजी… पर मुझे यह चिंता बनी रहती है कि वह बेचारा भूखा होगा।

बच्चे अपने मम्मी से – मम्मी में बंदर देखने चिड़ियाघर जाऊं?
मम्मी – बड़ा बेवकूफ हो, घर में मौसी के नटखट बच्चे आये हैं ।
और तू बंदर देखने चिड़ियाघर जा रहा है।

एक बार दो बच्चों में आपस में झगड़ा हो गया।
छोटा बच्चा गुस्से में बोला – देख तू अपने शब्द वापस लो ,
मैं तुम्हे पांच मिनट का समय देता हूं।
बड़े लड़के ने कहा – अगर मैं पांच मिनट में अपने शब्द वापस ना लूं तो, तो ?

कुछ देर विचार करने के बाद
छोटा लड़का बोला – अच्छा , तो तुम्हे कितना समय चाहिए?

पत्नी ने अपने पति से पूछा – क्यों जी नाव को स्त्रीलिंग ही क्यों माना गया है?
पति – क्योंकि वह हवा के साथ अपना रुख बदलती है।

एक आदमी ने एक कुत्ता खरीदा और कुत्ते के मालिक से पूछा – यह कुत्ता वफादार तो होगा ही!
मालिक – यह अव्वल दर्जे का वफादार है, क्योंकि इसको मैंने इसे तीन बार बेचा है और यह तीनों बार भागकर मेरे पास चला आया।

मालिक- मैं पहले ही बता दूं की मुझे एक जिम्मेदार नौकर चाहिए।
नया नौकर – साहब मैं बहुत जिम्मेदार हूं, इससे पहले मैंने जहां भी काम किया, गलती किसी की भी हो , जिम्मेदार मैं ही ठहराया जाता था।

एक सज्जन अपने पड़ोसी के घर गए और बोले – देखिए आपके लड़के ने मेरे कमरे का शीशा पत्थर मारकर तोड़ दिया।
पड़ोसी – आप उसके बातों पर ध्यान मत दीजिए, वह पागल है।
सज्जन आदमी – तो फिर अपने घर के शीशे क्यों नहीं तोड़ता?
पड़ोसी – लेकिन इतना पागल नहीं।

दिल चाहता है

मैं सोचता हूं कुछ लिखूं तेरे बारे में
ये दिल है कि छुपाने को कहता है।

मैं चाहता हूं कि चिल्ला के कहूं सबसे
ये दिल है कि चुप रहने को कहता है।

मैं चाहता हूं हल्का हो दिल के बोझ
ये दिल है कि बोझ ढोने को कहता है।

मैं चाहता हूं ये गम और प्यार का इजहार करुं
ये दिल है कि दिल ही दिल में दबाने को कहता है।

मैं चाहता हूं युद्ध विराम करूं दिल का
ये दिल है कि घमासान चाहता है।

अंतकाल

जब उम्र बिता भाई
तब जाके अकल आई।
क्या खोया क्या पाया
क्या सारी उम्र गंवाया।
आज तुझे पता चला
तेरी हैसियत कुछ नहीं।
जब आई हलक में जान
तब तुझे ,सुझे आसमान।
तुझे दिया जिन्दगी
तू समझा दिल्लगी।
कोई खेल में लागा
कोई मौज में लागा।
जब आई तेरी बारी
तू होश में जागा।
समय का तूने किया नहीं मान
अब रोये
क्या करे?
जब तेरा आया अंत समय
खोया सारा जिन्दगी

तू रहा पछताय,

कृष्ण – सुदामा

जब जहां की सारी हदें पार कर लो,
दुनिया की सारी इम्तहान पास कर लो,
जब तेरे पास कोई मंजिल ना बचा हो
तूने सारी मंजिलें पा ली हो,

जब ये दुनिया के गम तुझे सताने लगे
जब निराशा तुझे घेरने लगे हो,
तब मुझे याद करना मेरे दोस्त।
तब मुझे याद करना मेरे दोस्त।
मैं हूं तेरे साथ हर पल
तू याद करे ना करे।
जब तू मुझे सोचेगा ,
मेरे दिल में लहर उठेगा।
दीवारें कितनी भी हो तेरे मेरे
दरम्यान
मैं इंतजार करूंगा तेरी आहट का
तेरी आहट पा के सारी दीवार तोड़
दूंगा
दोस्त फिकर मत करना दुनिया के बातों का,
तू मेरा दोस्त है मेरा दोस्ती रहेगी।
जब तक ये दुनिया है ,ये बातें होती रहेगी।

सच

“सच अगर सच्चा है, तो उसे चीखना क्यों पड़ता है।”
Ps pooja

बेजुबान शब्द


आपके इस पोस्ट पर मेरे कुछ विचार।

इसको हम अपने समझ से शेयर कर रहे हैं
सब के सोचने का नजरिया अलग हो सकता है।
सच में हम इसको ऐसे समझ सकते है ।
सच की उम्र कितनी है?
अगर सच बच्चा है तो उसे चीखना पर सकता है।

अगर सच युवा है ताकतवर है तो उसे कहना या चीखना नहीं पड़ता।

अगर सच बुजुर्ग है तो भी वो कुछ कमजोर हो सकता है ,लेकिन चीखना नहीं पड़ता। अपने आपको वह साबित कर सकता है।

निष्कर्ष के रूप में हम ये महसूस करते हैं कि सच अगर ताकतवर है तो सही है अगर ताकतवर नहीं तो उसे हमें खुद ताकतवर बनाना होगा, उसके लिए हमें दूसरे माध्यमों का सहारा लेना होगा।

सच उदाहरण के रूप में कहीं अगर प्राकृतिक आपदा आती है तो हमें किसी को कुछ कहना नहीं पड़ता।
ये सब को मालूम हो जाता है।

लेकिन सच इतना युवा नहीं , बच्चा है तो उसे चीख कर अपनी बात रखनी परती है उसे अनेक माध्यमों का सहारा लेना पड़ता है।

कहीं कोई घटना घटती है तो उसकी जानकारी और उसकी सारी सच्चाई दबी रहती है ,
उसको उजागर करना पड़ता है।

कीमत

समय एक ऐसा पल है जिसको गुजरना ही है,
ये हम सब जानते है।फिर भी वक्त गुजरने के बाद हम हाथ मलते रह जाते है।
और वक्त रहते हम कोई काम नहीं कर पाते और हमेशा सोचते है वक्त बहुत है लेकिन समय बहुत तेजी से बदल रहा होता है।

सेहत – ऐसी ही हालात हम अपनी सेहत के साथ भी करते है
जब हम स्वस्थ रहते है तो बहुत सारा दबाव अपने ऊपर लेते है।
जैसे खाना जो भी होता है हम खाते जाते है, खाते जाते है। चाहे वह स्वास्थ्य पर कैसा भी असर डाले ।बिना सोचे समझे हम पेट भर लेते है।
इसी तरह हम अपने दिमाग के साथ भी करते है।
जो भी समाचार हो दिमाग में भरते जाते है ,
बिना सोचे समझे ,चाहे वह आपके दिमाग पर कैसा भी असर डाले।
अंत में पता तब जाके लगता है जब हमारी तबीयत खराब होती है।
सम्बन्ध – इसी तरह हमारे संबंधों के साथ भी होता है।
जब तक होता है उसकी अहमियत पता नहीं चलती।
जब संबंध नहीं रहते तब जाके उसकी अहमियत पता चलती है।
और हम पछताते रह जाते है।

हमें ऐसा लगता है समय, सेहत
और सम्बन्ध
इन तीनों की कोई कीमत नहीं होती, अक्सर इन सब को खोने के बाद इनकी कीमत का पत्ता चलता है।

छायावाद

हिंदी में छायावाद

हिंदी के विकास के क्रम में छायावाद का विकास द्विवेदी जी के कविता के पश्चात हुआ।
अगर मोटे तौर पर देखे तो छायावादी काव्य की सीमा 1928 ई. से 1996 ई.तक मानी जा सकती है।
छाया वाद के संदर्भ में आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने कहा है , ” छायावाद शब्द का अर्थ दो अर्थो में लेना चाहिए – एक तो रहस्यवाद के अर्थ में जहां उसका संबंध काव्य वस्तु से होता है,
अर्थात जहां कवि उस अनंत और अज्ञात प्रियतम को आलंबन बनाकर अत्यंत चित्रमयी भाषा में प्रेम की अनेक प्रकार से व्यंजना करता है।
छायावाद का दूसरा प्रयोग काव्यशैली विशेष के व्यापक अर्थ में है”।
छायावादी कवि प्रकृति को मानवीय रूप देकर उसके प्रति अनेक प्रकारों के भावों की अभिव्यक्ति करता है।

इसमें प्रायः सूक्ष्म एवम् अशरीरी सौंदर्य का चित्रण है।

इसके साथ – साथ इसमें अप्रस्तुत योजना,वैयक्तिक वेदना, कल्पना एवम् अहम भावना का आधिक्य भी पाया जाता है ।
छायावादी कविता व्यक्तिनिष्ठ,कल्पना प्रधान एवं सूक्ष्म है।

खामोशी

मेरे जज्बातों को दिशा दो

मेरे जीने की पता दो।

यूं खामोश रहकर बात ना बढ़ाओ

कुछ तो वफ़ा करो।।

खामोश मंजर की खता नहीं
ये तो हाल है दिल का।

अक्सर दिल की बातें दिल में ही
दबी रहती है।।

तू अनजान बनी रहती है
मेरी जज्बातों से।

मैं तरपता रहता हूं तेरी बातों से।।

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