यात्रा

अनवरत चलने वाला यात्रा है ये

बस इक पराव से मोह किस हद तक उचित है।

हर बार की तरह इस बार भी जाना तो पड़ेगा ही।

अपनी छोटी बड़ी सोच से उपर उठना तो होगा ही।

रात कितनी भी गहरी क्यों न हो

सवेरा तो होगा ही।

तेरे चैतन्य में प्रकाश तो फैलेगा ही।

तू सत्कर्म में रत हो।

तेरे आनंद का कारण तू ही है।

तेरा आनंद कहीं बाहर नहीं है।

तू क्षणिक सुख के चक्कर में,

अपनी असीम आनंद को छोड़ रहा।

तू जब खुद को समझ ना पाया,

तो दूसरों को क्या समझेगा।

इसलिए

तू तेरा समझ मैं मेरा समझता हूं,

बस यही होने दे।

तेरे समझ में जब तू नहीं आएगा,

मेरे समझ में जब तक मैं नहीं आऊंगा,

सारी दुनिया को क्या खाक समझ पाऊंगा।

सावधान आप सड़क पर हैं।

सावधानी हटी दुर्घटना घटी।


या ये कहें नजरे हटी दुर्घटना घटी।


सड़क पर चलते समय केवल आपका ठीक होना मायने नहीं रखता,

आप यातायात के नियमों का पालन करते हैं,
लेकिन आपने सावधानी नहीं बरती,
या नजरे बराबर नहीं रखी तो
दुर्घटना स्वाभाविक रूप से होगी।

क्योंकि केवल आपका नियमों का पालन करना,
आपको दुर्घटना से बचा नहीं सकता,

सड़क पर आप अकेले नहीं होते,
और ये जरूरी नहीं कि सब आपकी तरह नियम का पालन करता हो।

तो आप कैसे बचोगे?

इसलिए सावधानी हमेशा जरूरी है।
और साथ ही सड़क पर चलते समय या गाड़ी चलाते समय सड़क पर ही रहे ।

अपने मन को इधर उधर ना भटकाएं ।नहीं तो कहते हैं ना ।

मन आपका भटका ,तो आपके जीवन का खटका।

इसलिए तो कहतें है – सावधानी से चलें ,दुर्घटना से बचे।

कठपुतली

अब उसकी बातों में आकर अचानक उसने अपना इरादा
बदल लिया।

विभिन्न तरह के बातों को सुनते सुनते वह सत्य से दूर होता चला गया।

अब उसके लिए ये कठिन है सही और ग़लत को अलग करना।

सत्य और असत्य दोनों से अनजान है।

अब उसके फैसले उसके नहीं है।

ना उसका खाना उसका है ,

ना उसका विस्तर उसके अपने अनुसार है।

उसने अपने सोचने समझने कि शक्ति किसी और के हाथ में दे रखा है।

अपने शरीर पर जो कपड़े पहनते हैं उसमें भी उसकी मर्जी नहीं है।
उसने अपने आपको उसके हाथों की कठपुतली बना रखा है।

और ये अकेले नहीं है बेबस।

उसके आगे तो सब उसका ही सुनता है। सब गुलाम हो गए है।

सबको उसने सम्मोहित कर रखा है।

वही जो बताता सब खाते हैं।

आखिर कौन हैं वो?

जिसने हम सबको सम्मोहित कर रखा है।

कौन है?

वो जादूगर है।

विज्ञापन
हां विज्ञापन के कहे अनुसार तो हम लोग चलते है,

खाते,पीते और सोते हैं।

इसी के गुलाम है हम लोग,

इसी के हाथों के कठपुतली है।

चांद


चांद को देखा मैंने झुरमुट से निकलते ,

कभी इधर से तो कभी उधर से झांकते।

कभी बादलों में छिपते ,
कभी आसमां में खिलते।
कभी इतराते तो कभी,
बादलों कि सवारी करते।
चांद को देखा मैंने झुरमुट से निकलते
कभी इधर से तो कभी उधर से झांकते।
कभी रात को सुलाते ,
कभी खुद ही सो जाते।
कभी तनहाई में,
कभी तारों का महफ़िल सजाते।

चांद को देखा मैंने झुरमुट से निकलते
कभी इधर से तो कभी उधर से झांकते।

मझधार

क्या लिखूं ए जिन्दगी
मझधार में हूं
दिल को तलाश है
बेकरार भी हूं।
दिल अनजान है,
उदास भी हूं।
कभी कभी तो ऐसा सोचता हूं।
बदल दूं अपनी फितरत को पर,
कुछ ही पलों में फितरत अपना रंग दिखाता है,
और
मैं फिर से मैं हो जाता हूं।

कभी कभी राज से पर्दा हटते हटते,
राज और गहरा हो जाता है ।
हमको लगता है जान गया हूं सब कुछ ,
और कुछ ही पलों में,
अपने आपको छोटा पाता हूं।

टुकड़ों टुकड़ों में लिखता हूं,
या कहूं टुकड़ों टुकड़ों में जीता हूं।
ये दर्द है की घुट घुट के सहता हूं।

सुकून

ए मेरे दिल के सकून,
मैं तुझसे क्या उम्मीद करूं,
इस बिगड़ती माहौल में,
तेरे साथ चैन से रह पाऊंगा।
या तू भी साथ छोड़ देगा,
मेरे ख्वाब की तरह।
तुझे खोने के डर से छिपता फिरता हूं।
और तू जाने को तैयार है,
मौसम की तरह।

राहत

राहत मिलती है तेरी यादों से ,

मेरी जज्बातों को सकून मिलता है।

जब भी लिख के इजहार करता हूं,

जाने क्यों दिल को आराम मिलता है।

रात को आसमां देखने की आदत हो गई है,

टिमटिमाते तारों में तू नजर आती है।

कभी- कभी संगीत सी बज उठती है कानों में,

ऐसा लगता है जैसे तूने आवाज लगाई है।

अब छिपाने की आदत लग गई जिगरा ,

लोगों अब भी लगता है,

तू आसमां से मुझसे मिलने आती है।

राहत मिलती है तेरी यादों से ,

मेरी जज्बातों को सकून मिलता है।

जब भी लिख के इजहार करता हूं,

जाने क्यों दिल को आराम मिलता है।

माया

माया क्या है?

क्या हम सब इससे बंधे है?

क्या संसार सम्पूर्ण माया है ?

अब बात ये है कि हम माया को कैसे जाने?

इसका एक प्रत्यक्ष प्रमाण है।

की अगर कोई इंसान आपके अनुसार से कार्य नहीं कर रहा है,
तो मायावश आपको क्रोध आनी है।
अगर कोई आपका कार्य करे तो ,
या आपकी बड़ाई करे तो आप उसको पसंद करते है।

कोई आपका इज्जत करे तो आप खुश होते हो मायावश अच्छा अनुभव होता है।

यदि आपका कोई बुराई करे या आपकी बातों की अवहेलना करे तो मायावश आप उससे ईर्ष्या और द्वेष रखते हो।

आपको अपने मान अपमान का डर होता है ।

आपके लिए आपकी इज्जत ही सबसे बड़ी होती है ,
यही सब तो है माया – राग ,द्वेष ,प्रेम, घृणा ,क्रोध आदि ये सब माया के ही तो हथियार है।

और हमसब उसके शिकार है।

इसलिए तो कहते है जिसने माया का पार पाया उसके लिए मान और अपमान दोनों बराबर है।

आप उनका अपमान करो तो भी ठीक ,या आप उनको मान दो तो भी ठीक।

इनको पता है कि ये सब माया है,
और ये सब चलता रहेगा ।

रिश्ता

जाने क्या बात थी कुछ दिनों से उसने बात करना तो दूर की बात ,
मेरे तरफ देखना भी बंद कर दी थी।

मैं उसके इस बेरुखी से बहुत परेशान था ,
की मैंने आखिर क्या कह दिया ,
मेरे किस बात ने उसको चोट पंहुचाई है।

जिनको कल तक बात किए बिना चैन ना था, आज वो मेरे तरफ देखते भी नहीं,कई बार मैंने बात करने की कोशिश भी की ,लेकिन
उसने कोई जबाब नहीं दिया।

मेरी दिल की बेचैनी बढ़ती जा रही थी,

मैं रोज इस इंतजार में था कि कब वो आए जो बात हो सके,
इंतजार करते करते एक महीना बीत चुका था।

अब बर्दाश्त से बाहर हो चुका था,
अगले दिन मैं खुद ही उसके घर जाने का निश्चय किया।

उसके घर जाने के बावजूद वो मुझसे बात नहीं कर रही थी,
अंत में हारकर मैं उसके छोटी बहन से मिला और पूछा क्या बात है आपकी बहन उदास क्यों है।

तब उसने बताया कि वो किसी से छुप छुप कर मिलती और बात करती थी,।

मां ने पिताजी को बताया , और मां और पिताजी दोनों ने मिलकर कहा ,क्या कोई मुझसे बढ़ कर हो गया जो मुझसे बिना कहे तू उससे मिलती और बात करती है। या मेरे प्यार में कोई कमी रह गई?

जब तक मेरी बहन कुछ बोलती तब तक गुस्से में आकर मां ने कहा दिया अगर अब बात की या मिली तो मेरा मरा मुंह देखेगी।

उस दिन से वह ना वह उससे बात करती है, और ना ही मिलने जाती है ।
इतना सुन कर मैं वापस आ गया ।

रास्ते भर सोचता रहा कि ,क्या उसका फैसला सही था?

क्या उसके फैसले पर मुझे उसका साथ देना चाहिए?

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